आइकैच ने वर्क ऑर्डर से तीन दिन पहले ही जमा करा दी थी मुहर लगी ब्लैंक सिक्योरिटी डिपॉजिट

2019-07-02

राष्ट्रीय खेल घोटाले की ऐसी सच्चाई, जो 9 वर्षों में एसीबी भी नहीं ढूंढ पाई - 1



रांची

sportsjharkhand.com



एंटी करप्शन ब्यूरो पिछले नौ वर्षों से राष्ट्रीय खेल घोटाले की जांच कर रही है। छह-छह जांच अधिकारी बदले जा चुके हैं लेकिन दुःखद है कि घोटाले की अधिकांश परतें आज भी एनजीओसी की फाइलों में दफन हैं। पिछले डेढ़ वर्षों के अथक परिश्रम के बाद sportsjharkhand.com के हाथ मई-जून में राष्ट्रीय खेलों से जुड़ी लगभग 3 दर्जन फाइलें हाथ लगी हैं। घपले-घोटाले की बदबू से हर एक फाइल दूसरे से बीस, कोई भी उन्नीस नहीं। फाइलों के अध्ययन से साफ पता चलता है कि राष्ट्रीय खेल आयोजन से पहले राष्ट्रीय खेल आयोजन समिति (NGOC) की फाइलों पर घोटालेबाजों ने ऐसे-ऐसे खेल खेले जो कालांतर में घोटाले के धर्मग्रंथों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो चुके हैं। sportsjharkhand.com आनेवाले दिनों में अपने पाठकों को घोटाले के हर उस पहलू को दस्तावेजी सबूतों के माध्यम से अवगत कराएगा जो पिछले नौ वर्षों तक अनवरत चल रहे जांच के बावजूद आज तक अज्ञात (आप ज्ञात भी कह सकते हैं) कारणों से अलमारी की फाइलों में ही धूल फांक रहे हैं। शुरूआत करते हैं हैदराबाद की एक कंपनी आई-कैच को दिए गए साइनेज टेंडर से। 



क्या किसी टेंडर में सक्षम अधिकारी द्वारा वर्क ऑर्डर निर्गत किए जाने से तीन दिन पहले ही कंपनी काम की प्रत्याशा में सिक्योरिटी डिपॉॅजिट करने संबंधी पत्र टेंडर जारी करनेवाली एजेंसी के पक्ष में जमा कर देती है ? आपका जवाब ना होगा लेकिन राष्ट्रीय खेलों में वेंडर-NGOC-टेंडर कमिटी के कुछ अधिकारियों-पदाधिकारियों के घालमेल से यह आश्चर्यजनक काम भी संभव हो गया। दरअसल साइनेज के टेंडर में 19 दिसंबर 2008 को विभागीय मंत्री सह उपाध्यक्ष NGOC की सहमति मिलने के बाद निदेशक व राष्ट्रीय खेल घोटाले के नामजद आरोपी IFS पीसी मिश्रा ने 20 दिसंबर 2008 को हैदराबाद की आइकैच नामक कंपनी को वर्क ऑर्डर दिया। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से 20 दिसंबर 2008 को वर्क ऑर्डर जारी होने से तीन दिन पहले यानि 17 दिसंबर 2008 को ही आइकैच ने मुहर लगी ब्लैंक सिक्योरिटी डिपॉजिट का दस्तावेज जमा करा दिया था। ये हम नहीं बल्कि साइनेज से जुड़ी एनजीओसी की फाइल संख्या 42/2008 के 108वें और 114वें नंबर पेज पर रखे दस्तावेज बता रहे हैं (देखें तस्वीर)। ऐसा क्यों और किसके इशारे पर किया गया, ये जांच का विषय है। ACB ने जो चार्ज शीट दायर की है उसमें आईकैच कंपनी को 20 दिसंबर को ही साईनेज के एवज में दो-दो चेक जारी करने का आरोप तो नामजद आरोपियों पर लगाया है लेकिन उपरोक्त षडयंत्र के संदर्भ में कोई भी जिक्र नहीं है। ना ही षडयंत्र में शामिल सभी लोगों से अब तक पूछताछ ही की गई है। 



वर्क ऑर्डर से तीन दिन पहले ही खरीद लिया नन ज्यूडिसियल स्टांप


आइकैच को वर्क ऑर्डर 20 दिसंबर 2008 को मिला और उसी दिन NGOC के साथ करार हुआ। लेकिन करार के लिए 100 रुपये मूल्य का जो नन ज्यूडिसियल स्टांप प्रयोग में लाया गया है वो स्टांप भी आश्चर्यजनक रूप से 17 दिसंबर 2008 को ही खरीदा गया है (देखें तस्वीर)। यह कैसे संभव है कि फाइल पर 19 दिसंबर को विभागीय मंत्री की सहमति मिलने से दो दिन पहले ही कंपनी को पता चल जाए कि काम उसे ही मिलना है ? इस मामले में दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली दिखाई पड़ती है। 


17 दिसंबर 2008 का संयोग 


क्या यह महज संयोग हो सकता है कि वर्क ऑर्डर मिलने से तीन दिन पहले नन ज्यूडिसियल स्टांप 17 दिसंबर को खरीदे जाएं और फाइल के पेज संख्या 108 व 114 पर दर्ज मुहर लगे ब्लैंक सिक्योरिटी डिपॉजिट के दस्तावेज भी 17 दिसंबर को ही जारी की जाए ? क्या 17 दिसंबर को ही वर्कऑर्डर दिए जाने व एग्रीमेंट की तैयारी थी ? दस्तावेज तो यही बयान कर रहे हैं लेकिन ये तैयारी परवान नहीं चढ़ सकी, क्योंकि मंत्री ने 19 दिसंबर को इस प्रस्ताव पर अपनी मंजूरी दी। आई कैच को काम दिए जाने व करार किये जाने में इतनी जल्दबाज़ी किसके इशारे पर हो रही थी और इस षडयंत्र को कौन-कौन शामिल था ? इन सभी सवालों पर अब तक ACB की ओर से तीन नामजद लोगों के खिलाफ दर्ज़ चार्जशीट मौन है। जबकि तीन में से दो आरोपियों की भूमिका पूर्णतः/प्रत्यक्षतः संदेह के घेरे में है।


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राष्ट्रीय खेल घोटाले की ऐसी सच्चाई, जो 9 वर्षों में ACB भी नहीं ढूंढ पाई

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