Sports Jharkhand
...कि पैसा बोलता है
2016-09-19  12:39:24
महान क्रिकेटरों को अचानक प्राप्त हुए \"दिव्य ज्ञान\" पर सुशील की त्वरित प्रक्रिया

लोढ़ा कमिटी की सिफारिशों को लागू करने की डेडलाइन जैसे-जैसे करीब आ रही है, वैसे-वैसे बीसीसीआई के पक्ष में बयानवीरों के ज़ुबानी तीर चलने-चलाने का सिलसिला शुरू हो गया है। शनिवार को बीसीसीआई के \"पेड स्टाफ\" व एक टेस्ट मैच के कप्तान रवि शास्त्री ने लोढ़ा कमिटी की कुछ सिफारिशों पर तंज कसा और रविवार को पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर और कपिल देव ने भी रवि शास्त्री के सुर में सुर मिलाते हुए \'हुआं-हुआं\' करना शुरू कर दिया। और ये सब हो रहा है भारत-न्यूज़ीलैण्ड टेस्ट श्रृंखला के दौरान स्टार स्पोर्ट्स चैनल पर हो रहे चर्चा-परिचर्चा के दौरान। बीसीसीआई के \'पेड स्टाफ\' कमेंटेटर के रूप में जनमानस को वही सन्देश देने में जुटे हैं, जिनकी स्क्रिप्ट बीसीसीआई के आलाधिकारियों ने पहले से लिख दी है। क्या आपको याद है कि आखिरी बार इन महान क्रिकेटरों ने बीसीसीआई कैसे काम करे इस विषय पर अपनी जुबान खोली थी ? शायद नहीं ! क्योंकि कमेंटेटर बनने के लिए जो एग्रीमेंट हमारे पूर्व \'महान\' खिलाड़ी साइन करते हैं, उसमे दर्ज शर्तें उन्हें तय समय पर ही \"भौंकने\" का अधिकार देते हैं। गले में लगी \'पट्टी\' तो चैनल की होती है, लेकिन जुबान बीसीसीआई की गुलाम। जुबान खुली और आप गायब !


1983 वर्ल्ड कप सेमीफाइनल और फाइनल के हीरो मोहिंदर अमरनाथ तो आपको याद ही होंगे! कहाँ हैं आजकल? चयनकर्ताओं को \"जोकरों का समूह\" क्या बोला बीसीसीआई के \"शिकारी कुत्तों\" ने ऐसा नोच डाला कि दशकों से कहीं नज़र नहीं आये। वर्ष 1996 से बीसीसीआई के कमेंटेटर रहे हर्षा भोगले से तो आप परिचित होंगे ही। क्यूँ बाहर हैं आजकल ? कानपुर मैच के दौरान (कुछ माह पहले वनडे के दौरान) अंग्रेजी और हिंदी कमेंट्री बॉक्स में दूरी ज़्यादा होने की शिकायत करनी महँगी पड़ गयी। बीसीसीआई के एक कर्णधार ने किनारा पकड़ा दिया। ये उदाहरण इसलिये कि संस्था के काम करने का तरीका/सलीका आप जान जाएँ। दोस्तों की हालत देख गावस्कर, कपिल और शास्त्री बीसीसीआई के पक्ष में जुबानी बैटिंग करते हुए नज़र आ रहे हैं। ऐसा करके वे अपनी और बीसीसीआई की बेचैनी और लाचारी को भी प्रदर्शित कर रहे हैं। 


ध्यान देने वाली बात ये है कि ये परिवर्तन कब से आया। जस्टिस काटजू के बीसीसीआई से जुड़ने से पहले किन-किन पूर्व खिलाड़ियों और संघ के पदाधिकारियों ने सिफारिशों पर प्रतिकूल टिप्पणियां दी थीं। शायद कोई नहीं ! अचानक अभी प्रतिक्रियाएं क्यूँ आनी शुरू हो गयी हैं ? सवालों में ही जवाब छुपे हैं।


एक बात और जब श्रीनिवासन अध्यक्ष थे तब बीसीसीआई की फाइनेंसियल कमिटी (वर्तमान अध्यक्ष अनुराग ठाकुर और ज्योतिरादित्य सिंधिया भी शामिल थे) ने राज्य संघों का अनुदान बढ़ाने से इनकार कर दिया था, कारण बताया था कि करोड़ों रुपये वकील की फीस के रूप में खर्च कर दिए गए हैं। और जब खुद अध्यक्ष बनें तो जस्टिस काटजू साहब को नियुक्त कर दिया। जस्टिस काटजू साहब बीसीसीआई को सशुल्क या नि:शुल्क सेवा दे रहे हैं, ये जानकारी बाहर आनी शेष है। 


वैसे बीसीसीआई के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर अपनी मर्ज़ी के मालिक रहे हैं। हो सकता है उन्हें कोर्ट की दखल से ऐतराज़ हो। हिमाचल क्रिकेट संघ के अध्यक्ष रहते हुए वे रणजी टीम के चयनकर्ता बने। हद तो तब हो गयी जब खुद को रणजी टीम में बतौर कप्तान चुना और मैच खेल भी लिया। हो सकता है अनुराग जी जब से बीसीसीआई अध्यक्ष बने हों तब से भारतीय टीम की कप्तानी की इच्छा कुलांचे भर रही हो, भला इस स्थिति में दूसरे का दखल अच्छा लगेगा क्या ? सुप्रीम कोर्ट के फैसले जब तक दूसरों (श्रीनिवासन) को हानि पहुंचा रहे थे तब तक बढ़िया थे, जब खुद प्रभावित होने लगे तो अनुराग ठाकुर जी और उनकी टीम को \"काटजू\" का दिव्य ज्ञान प्राप्त हो गया।


ये सच है कि कोर्ट की किसी भी सिफारिश पर अपनी प्रतिक्रिया देने का सबको हक़ है, लेकिन अपनी प्रतिक्रिया। दूसरों की लिखी स्क्रिप्ट नहीं। बीसीसीआई पिछले 80-85 सालों से अपनी मर्ज़ी से चल रही थी, सदस्यों की आंतरिक लड़ाई कोर्ट तक पहुंची। भ्रष्टाचार और कॉन्फ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट के आरोपों में फंसे अध्यक्ष को हटाने के लिए बीसीसीआई तैयार नहीं थी, कोर्ट ने हटाया। आपने फैसला माना और तालियां भी बजाईं। अब तालियां बजाने के बाद सिफारिशें लागू करने में क्या दिक्कत है। ज़्यादातर सिफारिशें सामान अधिकार और पारदर्शिता से जुड़ी हैं, जिनसे सच्चाई सामने आएगी। इस सच्चाई से डरने वाले बीसीसीआई के प्रशासक ही \'रंगा सियारों\' को हुआं-हुआं करने को मजबूर कर रहे हैं, वो भी गांधी जी की बदौलत ! लाल और हरे कागजों पर छपे गांधी जी की बदौलत। यही सत्य है, 100 फीसदी अकाट्य सत्य।