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जन्मदिन विशेष : भारतीय हॉकी टीम के सिरमौर धनराज पिल्लै ! (कयूम खान/वरिष्ठ पत्रकार)
2017-07-16  07:49:49

कयूम खान

sportsjharkhand.com 

लोहरदगा

सपने देखने पर किसी तरह की रोक नहीं है। कोई भी इंसान कैसा भी सपना देख सकता है। और लाखों-करोड़ों लोग खुद को लेकर बड़े-बड़े सपने देखते भी हैं…पर कुछ गिने-चुने ही होते हैं जो इन्हें पूरा करने के लिए अपनी जान लगा देते हैं। इन्ही गिने-चुने लोगों में एक नाम आता है महान हॉकी ख़िलाड़ी धनराज पिल्लै का। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि धनराज पिल्लै भारतीय हॉकी के सिरमौर हैं। 

हॉकी के इस महान सितारे का जन्म पुणे के निकट खिड़की में 16 जुलाई, 1968 को हुआ था। धनराज बहुत ही सामान्य परिवार से हैं, उनके माता-पिता मूलतः तमिलनाडू से थे लेकिन रोजी-रोटी की तलाश वे खिड़की आ गए थे। माता-पिता ने पैसों के अभाव में जन्मे अपने चौथे पुत्र का नाम इस उम्मीद में धनराज रखा कि वो उनकी किस्मत बदल सके…और जैसा कि हम जानते हैं, आगे चलकर हुआ भी यही।

धनराज का बचपन Ordinance Factory Staff Colony में बीता, जहां उनके पिता बतौर ग्राउंड्समैन काम करते थे। बड़ा परिवार और सीमित आय के कारण धनराज का परिवार सुख-सुविधाओं के अभाव में ही रहता था। खुद धनराज टूटी हुई हॉकी और फेंकी हुई बॉल से खेला करते थे और ऐसे करने की प्रेरणा उन्हें उनकी माँ से मिलती थी। तमाम तकलीफों के बीच भी उनकी माँ हमेशा अपने पाँचों बेटों को हुई खेलने के लिए प्रोत्साहित किया करती थीं। जब धनराज छोटे थे तब भारत में हॉकी ही सबसे लोकप्रिय खेल था और अक्सर बच्चे यही खेल खेला करते थे।

शाम को सभी लड़के चॉल में हॉकी खेलने के लिए इकठे हो जाते थे। दुसरे लड़के तो अच्छी हॉकी लेके आते पर पिल्लै परिवार के पास पांच-पांच हॉकी स्टिक खरीदने की क्षमता नहीं थी। उसमे भी धनराज तो छोटे थे इस वजह से उन्हें यदा-कदा ही अच्छी स्टिक हाथ में पकड़ने का मौका मिलता था। धनराज के बड़े भाई उनको टूटी हुई हॉकी स्टिक गुंदर और सुतरी से बांध के देते थे और साथ ही एक बेकार सी बॉल भी खेलने के लिए दिया करते थे। धनराज से कहा जाता-तू इसी से प्रैक्टिस कर और जब तू अच्छा खेलने लगेगा तब तुझे अच्छी स्टिक मिलेगी और बड़े लोगों के साथ खलने का मौका भी मिलेगा।

धनराज को तब ये सब उतना अच्छा नहीं लगता था, कई  बार वो इस खेल को छोड़ने का भी बोलते थे पर हर बार उनकी उनकी माँ उन्हें समझातीं कि हॉकी कभी मत छोड़ना। तू और ज्यादा प्रैक्टिस कर और जब तेरा खेल बहुत अच्छा हो जायेगा तब तू हॉकी टीम में खेलेगा। माता के यह शब्द धनराज को वापस हॉकी खेलने के लिए प्रोत्साहित करते और वह पहेले से ज्यादा अच्छा करते। शुरू से इस तरह की गयी प्रैक्टिस आगे चलकर उनके बहुत काम आयी। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि धनराज के बड़े भाई रमेश भी हॉकी के बहुत अच्छे खिलाडी थे और वे भी इंटरनेशनल मैचों में भारत की ओर से खले।

धनराज 1985 के आस-पास अपने बड़े भाई के पास मुंबई चले गए, और उनके गाइडेंस में प्रशिक्षण लेने लगे। धनराज शुरू से ही महान फॉरवर्ड खिलाड़ी मोहम्मद शाहिद से प्रभावित थे और उन्हें अपना आदर्श मानते थे। वे उन्ही को कॉपी करने की कोशिश करते थे और मुंबई आकर वे एक खुद को एक द्रुत गति वाले बेहतरीन स्ट्राइकर के रूप में विकसित करने लगे। जब आपके अन्दर टैलेंट होता है और उसे निखारने में आप दिन रात एक कर देते हैं तो दुनिया भी उसे अनदेखा नहीं कर पाती। धनराज के निखरे खेल ने उन्हें महिंद्रा एंड महिंद्रा क्लब में जगह दिला दी जहां उन्हें भारत के तत्कालीन कोच J.M. Carvalho द्वारा बेहतरीन प्रशिक्षण मिला। धनराज को पहली बार 1989 में भारतीय हॉकी टीम में स्थान मिला और उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ के नहीं देखा।

1989 से 2004 तक के 15 साल के अपने करियर में उन्होंने 339 इंटरनेशनल मैच खेले और करीब 170 गोल किये। वो दुनिया के एक मात्र खिलाडी हैं जिसने–चार ओलम्पिक, चार वर्ल्ड कप, चार चैंपियनस ट्रॉफी, और चार एशियाई गेम्स में खेलने का कीर्तिमान बनाया है। उनकी कप्तानी में भारत ने 1998 और  2003 में एशिया कप जीता। इस तरह एक के बाद एक सफलता के शिखर पर चढ़ते हुए उन्होंने अपने नाम को सार्थक कर दिखाया। केवल देश में ही नहीं दुनिया भर में धनराज के खेल को वाहवाही मिलने लगी। ब्रिटेन , फ्रांस, हांगकांग, मलेशिया और जर्मनी के अलावा भी कई देशों में धनराज क्लब हॉकी खेल चुके हैं। भारतीय हॉकी खिलाड़ी अर्जुन हलप्पा का कहना है कि आज तक धनराज जैसा कोई कप्तान नहीं रहा है…उनकी जगह कोई नहीं ले सकता।

इस महान खिलाड़ी को जन्मदिन पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !


नोट : लेखक लोहरदगा के वरिष्ठ पत्रकार हैं।